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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 91, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

चितो यच्चेत्यकलनं तन्मनस्त्वमुदाहृतम् । चिद्भागोऽत्राजडो भागो जाड्यमत्र हि चेत्यता ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

भाव यह है कि विषयावच्छिन्न चैतन्य और मनोवच्छिन्न चैतन्य के इन्द्रिय द्वारा अभिन्न यानी अपृथक्‌ होने पर प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । जो वस्तु दूर है, इन्द्रिययोचर नहीं है, उसका अनुमान आदि से ज्ञान होने पर भी वह परोक्ष है प्रत्यक्ष नहीं है । यही दर्शनशास्त्र की प्रक्रिया यहाँ पर दर्शा्ड गई है । दूसरे पक्ष में कहते हैं । प्रमेय का उपलम्भ में अन्तभव होने पर उपलम्भ के विषय पदार्थ की चित्स्वभावता ही अवशिष्ट रहती है, इसलिए इस सबको अजड ही यानी चेतन ही समझो, क्योंकि पूर्वोक्त दो चैतन्यों का (प्रमातृचैतन्य और प्रमेयचैतन्य का) वृत्तिद्वारक ऐक्यलक्षण सम्बन्धसे ही उपलम्भ होता है, ऐसी अवस्थामें उपलम्भ न होने पर तथा उपलम्भ होने पर जड़चेतनभेद दुर्घट है ॥ ३ ५॥ जड़ और चेतन के भेद के दुर्घट होने पर जो फलित अंश निकला, उसे कहते हैं। जैसे महामरू में पत्ते, लता आदि नहीं रहते, वैसे ही अनिर्देश्य पदमें जड़त्व, चेतनत्व आदि शब्दार्थ नहीं है ॥ ३ ६॥ उस चित्‌ की चेत्याकार कल्पना ही मनस्त्व है । उसीमें जडाजड विकल्प होता है, उस जडाजड़ के विकल्प का विवेक ही नि्मनस्कता है, इस आशय से कहते हैं। चित्‌ की जो चेत्याकार कल्पना है, वही मनस्त्व कहा गया है, उसमें जो चिद्‌भाग है, वह अजड है ओर चेत्यांश में जाड्य (जडत्व) है