Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verses 6–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 91, verses 6–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 6-10
संस्कृत श्लोक
त्वं सृष्ट्वेह प्रजास्तिष्ठ बुद्ध्याकाशो ह्यनन्तकः ।
चित्ताकाशश्चिदाकाश आकाशश्च तृतीयकः ॥ ६ ॥
अनन्तास्त्रय एवैते चिदाकाशप्रकाशिताः ।
एकं द्वौ त्रीन्बहून्वापि कुरु सर्गाञ्जगत्पते ॥ ७ ॥
स्वेच्छयात्मनि तिष्ठ त्वं किं गृहीतं तवैन्दवैः ।
ब्रह्मोवाच ।
अथैन्दवजगज्जाले भानुनैवमुदाहृते ॥ ८ ॥
मया संचिन्त्य सुचिरमिदमुक्तं महामुने ।
युक्तमुक्तं त्वया भानो विततं हि किलाम्बरम् ॥ ९ ॥
मनश्च विततं वापि चिदाकाशश्च विस्तृतः ।
तद्यथाभिमतं सर्गं नित्यकर्म करोम्यहम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तब मेरी सृष्टि के लिए अवकाश कहाँ है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
आप इस अनन्त स्वचित्ताकाश में प्रजा की सृष्टि करके स्थित होइए, क्योंकि चित्ताकाश,
चिदाकाश और परमाकाश, ये तीनों अनन्त हैं और ये तीनों चिदाकाश से प्रकाशित हैं। हे
जगत्पते, आप एक, दो, तीन अथवा बहुत सृष्टियों को कीजिए और इच्छानुसार अपनी आत्मा
में स्थित होइए | ऐन्दवों ने आपका क्या ग्रहण किया है ? ब्रह्माजी ने कहा : हे महामुने, तदनन्तर
ऐन्दव जगतों के विषयमें भानु के ऐसा कहने पर चिरकाल तक विचार कर मैंने यह कहा : हे
भानो, तुमने बहुत युक्तियुक्त कहा, क्योंकि पूर्वोक्त चार प्रकार का आकाश विस्तृत है, मन
भी विस्तृत है और चिदाकाश भी विस्तृत है, इसलिए अपने अभिमत नित्यकर्मरूपी सृष्टि को
मैं करता हूँ