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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 92, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

यत्पश्यति तदेवाशु फलीभूतमिदं मनः । सह हर्षविषादाभ्यां भुङ्क्ते तस्मात्तदेव तत् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

सृष्टिकर्तृत्व की तरह सृष्टिभोक्तृत्व भी मनमें ही है, ऐसा कहते हैं- यह मन भावना से जिसे देखता है, झटपट फलरूप में परिणत हुए उसीका हर्ष और विषाद से उपभोग करता है, इसलिए जो कर्ता है, वही भोक्ता है