Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 92, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
प्रतिभानुपदं चेतश्चन्द्रेऽप्यग्निशिखाशतम् ।
दृष्ट्वा दाहमवाप्नोति दग्धं च परितप्यते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त अर्थ को उदाहरण द्वारा दशति हैं।
अनुसन्धान यानी भोक्ता के अदृष्ट से उदूबोधित संस्कार का अनुसारी मन चन्द्रमामें भी
सैंकड़ों अग्निज्वालाओं को देखकर दाह को प्राप्त होता हे ओर जलकर दुःखी होता हे । यह
बात विरही पुरुषो में प्रसिद्ध हे, यह अर्थ हे