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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 92, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अथ नास्तीह वा देहः केवलं चेतसैव सः । मुधानुभूयते स्वप्नमृगतृष्णाद्विचन्द्रवत् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

देह मनकी अपेक्षा न्यून सत्तावाली है, अतएव उस पर शाप आदि का आक्रमण होने पर भी मन पर शाप आदि का आक्रमण नहीं होता, यो विवर्तवाद का अवलम्बन कर उक्त दोषके परिहार की आशंका करते हैं। यदि कहिए यहाँ देह कोई पदार्थ ही नहीं है, केवल मनसे ही स्वप्न, मृगतृष्णा और दूसरे चन्द्र के तुल्य उसका मिथ्या ज्ञान होता है