Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 93, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
तस्मादनाख्यानाद्ब्रह्मणः सर्वतः सर्वमनाख्यानमुत्पद्यते स्वयमेव तद्धनतां प्राप्य मनः संपद्यते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
अव्याकृत नामरूपवाले उस ब्रह्म से चारों ओर से अतिसूक्ष्म होनेके कारण
नामसम्बन्ध के अयोग्य निर्विकल्प ज्ञान से प्रकाशित सम्पूर्ण प्रपंच उत्पन्न होता है वह समय
पाकर संकल्पविकल्परूप मननकी सामर्थ्य की उत्पत्ति से स्वयं घनता को प्राप्त होकर मन
बन जाता है