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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, Verses 20–23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 93, verses 20–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 20-23

संस्कृत श्लोक

काश्चिद्विज्ञातविज्ञानाः परमेव पदं गताः । वातोद्भूताः पयोमध्यं सामुद्रा इव बिन्दवः ॥ २० ॥ उत्पत्तिः सर्वजीवानामितीह ब्रह्मणः पदात् । आविर्भावतिरोभावभङ्गुरा भवभाविनी ॥ २१ ॥ वासनाविषवैषम्यवैधुर्यज्वरधारिणी । अनन्तसंकटानर्थकार्यसत्कारकारिणी ॥ २२ ॥ नानादिग्देशकालान्तशैलकन्दरचारिणी । रचितोत्तमवैचित्र्यविहिताऽऽसंभ्रमाऽसती ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वायु से उड़ाये गये समुद्र के बिन्दु समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही जिन्होंने तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लिया है, ऐसे कोई जीव परम पद को पहले ही प्राप्त हो गये हैँ । इस प्रकार परमपदरूप ब्रह्म से सम्पूर्ण जीवों की उत्पत्ति यहाँ हुई हे । यह उत्पत्ति आविर्भाव (प्रकट होना) ओर तिरोभाव से (छिपने से) क्षण भंगुर है, विविध जन्मों से शोभायमान है, वासनारूपी विषय की विषमता से हुई व्याकुलतारूपी ज्वर को धारण करती है, अनेक दुःखों से पूर्ण अनर्थकारी कार्यों का सत्कार करनेवाली है, अनेक दिशाओं, अनेक देशों, अनेक कालों में विविध पर्वतों की गुफाओं में कर्मफल का भोग कराती है, रची गई उत्तम विचित्रताओं से उसने चारों ओर भ्रमों का निर्माण कर रक्खा है, परमार्थरूप से वह असत्य है