Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 94, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 94, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 94 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
इत्थं जगत्सु विविधेषु विचित्ररूपास्तस्येच्छया भगवतो व्यवहारवत्यः ।
आयान्ति यान्ति निपतन्ति तथोत्पतन्ति रूपश्रियः कणघटा इव पावकोत्थाः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
इनमें कोई प्राणिवर्ग चिरकाल से जन्म-
मरण आदि भोग रहे हैं और हजारों जन्मों के बाद वे लीन होंगे ओर किन्हीं के अभी कुछ ही
जन्म व्यतीत हुए हैं, यों उनकी व्यवस्थिति है ॥ ३ १॥ वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार भगवान्
परब्रह्म परमात्मा की इच्छा से व्यवहार करनेवाले, उपाधिरूप शोभावाले, विलक्षण विलक्षण
रूपों से युक्त पूर्वोक्त प्राणिवर्ग अग्नि से निकली हुई चिनगारियों के समान विविध जगतों में
आते हैं, जाते हैं, एक जन्म से दूसरे जन्म में भ्रमण करते हैं और फिर उत्पन्न होते हैं