Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 95, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
हेतुर्विहरणे तेषामात्मविस्मरणादृते ।
न कश्चिल्लक्ष्यते साधो जन्मान्तरफलप्रदः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
उनकी उत्पत्ति में न कर्म हेतु है और न और कुछ हेतु है, क्योकि जव पहले कर्ता रहेगा तब
न कर्म होंगे, इसलिए परिशेष से केवल पूर्वोक्त अज्ञान ही उनकी उत्पत्तिमें निमित्त है, ऐसा
कहते हैं।
है सज्जनशिरोमणे श्रीरामजी, उन दैत्य, नाग, मनुष्य, देवता आदि संसारभ्रमण में
आत्मस्वरूप के विस्मरण के सिवा अन्यान्य जन्मरूपी फल देनेवाला दूसरा कोई हेतु नहीं
दिखाई देता