Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 95, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अविसंवादिनार्थे यद्यत्प्रामाणिकदृष्टिभिः ।
वीतरागैर्विनिर्णीतं तच्छास्त्रमिति कथ्यते ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
तात्पर्य यह है कि कर्ता की अनादिता तो कही नहीं जा सकती, क्योकि कर्तृत्व को यदि
स्वाभाविक धर्म मानें, तो जैसे अग्नि की अनादि स्वभाववाली उष्णता हजारो उपायो से मिटाई
नहीं जा सकती वैसे ही अनादि स्वभाववाले कर्तृत्वका भी हजारों उपायों से परिहार नहीं किया
जा सकेगा । ऐसी अवस्थारमे मोक्ष कथमपि नहीं हो सकेगा । यदि कर्तृत्वको ओपाधिक मानो,
तो वह उपाधि अविद्या है अथवा अन्य कुछ है ? पहले पक्षका फलतः सिद्धान्त के परिशेष
पक्षे ही अन्तभवि हो गया । किंच, अविद्या आत्मा में कर्तृत्व का आपादन स्वतः करती है
अथवा अन्य किसीकी सहायता से ? स्वतः तो कर नहीं सकती, क्योकि अविद्या में स्वतः
करतृत्वापादन होने पर युषुप्ति. मूर्च्छा ओर प्रलय में भी आत्मा में कर्तृत्व की आपत्ति होगी ।
यदि किये अन्य की अपेक्षासे अविद्या कर्तृत्वका आपादन करती है, तो जिसकी मुखापेक्षी
होकर अविद्या कर्तृत्व का आपादन करती है वही उपाधि होगी, अविद्या उपाधि न होगी ।
उपाधि की तो कोई उपाधि होती नही । दूसरे पक्षम भी यानी उपाधि अविद्या से अन्य है, इस
पक्षमे भी कह उपाधि अविद्याकी कार्य है या स्वतन्त्र है 2 स्वतन्त्र है इस पक्षमे यदि वह अनादि
है, तो सुषुप्ति और प्रलयमे भी कर्तृत्व का आपादन करेगी । यदि सादि है, तो उससे उपहित
कर्तुत्व भी सादि ही होगा, यों अनादि कर्तृस्िद्धि नहीं होगी । उपाधि अविद्याकार्य है, इस पक्षे
भी यही दोष है, इसलिए यद्यपि आत्मा नित्य है तथापि कर्त-उपाधिसम्बन्ध के प्रतिकल्प और
प्रतिदिन भिन्न अभेद भी होता है । उसमें आत्मविस्मरण ही बीज है, यह पक्ष ही यौक्तिक दृष्टि
से अवशिष्ट होता है । इस पक्ष में आगे अनुपपत्ति दशनिवाले श्रीरामचन्द्रजी उसके अनुकूल
भूमिका रचने के लिए शास्त्र का लक्षण कहते है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, प्रामाणिक दुष्टिवाले (अलौकिक यानी धर्म और ब्रह्म में
प्रमाणभूत श्रुति से जिनकी दृष्टि उत्पन्न हुई हे) वीतराग मनु आदि ने धर्माधर्मरूप अर्थ में
स्वमूल श्रुति से विवाद न करनेवाले (श्रुत्यविरोधी) मीमांसा के न्यायो से निर्णय करके जो जो
स्मृति, पुराण कल्पसूत्र, इतिहास आदि रचे हँ वे “शास्त्र नाम से कहे जाते हँ । भाव यह कि
श्रुतियाँ और श्रुतिमूलक स्मृतियाँ आदि अलौकिक अर्थ में प्रमाण हैं