Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verses 20–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 95, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
कर्मणा क्रियते कर्ता कर्त्रा कर्म प्रणीयते ।
बीजाङ्कुरादिवन्न्यायो लोकवेदोक्त एव सः ॥ २० ॥
कर्मणो जायते जन्तुर्बीजादिव नवाङ्कुरः ।
जन्तोः प्रजायते कर्म पुनर्बीजमिवाङ्कुरात् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
बीज और अंकुर के सदृश कर्म से कर्ताकी सृष्टि होती है और कर्ता
से कर्म का निर्माण होता है, वह न्याय लोक और वेदमें प्रसिद्ध है जैसे बीज से नूतन अंकुर
उत्पन्न होता है, वैसे ही कर्म से जन्तु उत्पन्न होता है। जैसे अंकुर से पुनः बीज होता है, वैसे
ही जन्तु से कर्म होता है