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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 95, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

यया वासनया जन्तुर्नीयते भवपञ्जरे । तद्वासनानुरूपेण फलं समनुभूयते ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

कर्म के समान प्राक्तन वासना भी कर्ता की उत्पत्ति में हेतु है, ऐसा कहते हैं। जिस वासना से जीव संसाररूपी पिंजड़े में प्रविष्ट किया जाता है, उस वासना के अनुरूप उसे फल का भी अनुभव होता है