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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 95, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

वह्न्यौष्णयोरिव सदा श्लिष्टयोश्चित्तकर्मणोः । द्वयोरेकतराभावे द्वयमेव विलीयते ॥ ३७ ॥ चित्तं सदा स्पन्दविलासमेत्य स्पन्दैकरूपं ननु कर्मविद्धि । कर्माथ चित्तं किल धर्मकर्मपदं गते राम परस्परेण ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

अग्नि और उष्णताकी भाँति सदा अभेद से मिले हुए दोनों में से-चित्त और कर्म में से-एक का अभाव होने पर दोनों ही विलीन हो जाते हैं