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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । मनो हि भावनामात्रं भावना स्पन्दधर्मिणी । क्रिया तद्भावितारूपं फलं सर्वोऽनुधावति ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

एक का विनाश होने पर दूसरे का विनाश होता है, इसमें उपपत्ति दर्शा रहे श्रीवसिष्ठजी उपसंहार करते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्त को सदा स्पन्दरूप विलास को प्राप्त होकर एकमात्र स्पन्दरूप (विहित और निषिद्ध के आचरण द्वारा पुण्य-पाप धर्माधर्मरूप में परिणत हुआ) कर्म जानिये और कर्म भी पुण्यपाप के फलके भोग के अनुरूप स्पन्दरूप विलास को प्राप्त होकर चित्तरूप में परिणत होता है । अतएव लोक में वे दोनों चित्त और कर्म धर्म और कर्म शब्द से कहे जाते हैं ॥३ ८॥ पंचानबेवाँ सर्ग समाप्त छानबेवाँ सर्ग कर्मों की विलक्षणता से नाना प्रकार की आकृति धारण करनेवाले मन के विविध नामों का प्रतिपादन तथा उसकी शुद्धि के लिए तत्त्व का निरूपण | श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, मन क्या है मन पहले अनुभव में आई हुई वस्तुओं की केवल भावना है, जो विकल्पना या विभावना शब्द से भी पुकारी जाती है। यह भावना स्पन्दरूप धर्म से युक्त होकर विहितप्रतिषिद्धरूपा क्रियामें परिणत होती है । अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण अदृष्टभावापन्न उस क्रिया के जन्मान्तर आदिरूप फल का सब जन्तु अनुसरण करते हैं