Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
विस्तरेण मम ब्रह्मन् जडस्याप्यजडाकृतेः ।
रूपमारूढसंकल्पं मनसो वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, मन जड़ होता हुआ भी अजड के
सदृश आकृतिवाला है, उसका संकल्पारूढ रूप (आकार) आप विस्तारपूर्वक कहने की कृपा
कीजिए