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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

स्फुरत्यात्मविनाशाय विस्मारयति तत्पदम् । मिथ्याविकल्पजालेन तन्मलं परिकल्प्यते ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

*विस्मृतिर्मलमेव च“ इस पाठ में दो नामों का साथ ही व्याख्यान करते हैं। जब शुद्ध चेतन आत्मस्वरूप के अत्यन्त अदर्शन के लिए स्फुरण को प्राप्त होता है, तब वह मल नाम से पुकारा जाता है, आत्मस्वरूप का विस्मरण करता है, अतः 'विस्मृति" कहलाता है यह अर्थ है