Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अस्त्यात्मतत्त्वं विमलं द्वितीया दृष्टिरङ्किता ।
जाता ह्यविद्यमानैव तदा विद्येति कथ्यते ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जब शुद्ध
चेतन अविद्यारूप कलंक से युक्त होने के कारण उत्पन्न हुई दूसरी दृष्टि (प्रपंचप्रतीति) तीनों
कालों में अविद्यमान ही है, ऐसे बोध को प्राप्त होता है, तब विद्या कहा जाता हे