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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

चित्ततामुपयाताया गतायाः प्रकृतं पदम् । स्वैरेव संकल्पशतैर्भृशं रूढिमुपागताः ॥ ३२ ॥ चेतनीयकलङ्काङ्काज्जाड्यजालानुपातिनी । संख्याविभागकलना स्ववैकल्याकुलेव चित् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्तरूपता को प्राप्त हुए अतएव प्रस्तुत संसारपद को पहुँचे हुए शुद्ध चेतनके अपने ही सैंकड़ों संकल्पों से ये नामान्तर योगरूढिको प्राप्त हुए हैं