Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 34–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

जीव इत्युच्यते लोके मन इत्यपि कथ्यते । चित्तमित्युच्यते सैव बुद्धिरित्युच्यते तथा ॥ ३४ ॥ नानासंकल्पकलिलं पर्यायनिचयं बुधाः । वदन्त्यस्याः कलङ्किन्याश्च्युतायाः परमात्मनः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

एक ही शुद्ध वेतन के मन, बुद्धि आदि संख्याभेदो की कल्पना कैसे हुई ? इस पर कहते हैं । चूँकि चिति मेँ चेतनीय हूँ यानी मैं अज्ञ हूँ” इस प्रकार स्वयं अनुभव के योग्य जो अज्ञानरूपी कलंक अथवा चेतनीयों से (विषयों से) प्राप्त जो द्वैतवासनारूपी कलंक उनकी सन्निधि से अपने पूर्व स्वरूप की विकलता से आकुल-सी होकर देह आदि जड़समुदाय के उन्मुख होती है, अतः उसके मन, बुद्धि आदि संख्याभेद की कल्पना होती है ॥३ ३॥ पूर्वोक्त भेदकल्पना को, पुनः विवेचनकर, कहते हैं। वह शुद्ध चित्‌ लोक में "जीव" नामसे कही जाती है, "चिति" कही जाती है और वही “बुद्धि कही जाती है । अथवा इस विषय को यों मनोगत करना चाहिये कि परमात्मपद से च्युत हुई अत: अज्ञानरूपी कलंकवाली संवित्‌ की ही इस प्रकारकी नाना संकल्पनाओं को विद्वानों ने ये भिन्न नाम दे रक्खे हैं