Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
भावः सदसतोर्मध्ये नृणां चलति यश्चलः ।
कलनोन्मुखतां यातस्तद्रूपं मनसो विदुः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
लोगों के आधुनिक व्यवहार में भी मन का रूप प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं ।
यह खम्भा है या पुरुष है, यों विकल्पव्यवहारमें सत्-असत् दोनों कोटियोंमें जो भाव झूले
की नाई झूलता है और दोनों कोटियों में स्मृतिपूर्वकता को प्राप्त होता है, यानी दोनों पक्षों में
अवस्थित होता हुआ भी एक पक्षमें स्थिर नहीं होता, उसे विद्वान मन का रूप कहते हैं