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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

नाहं वेदावभासात्मा कुर्वाणोऽस्मीति निश्चयः । तस्मादेकान्तकलनस्तद्रूपं मनसो विदुः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मा के चिद्रूप होने के कारण सदा भासित होने पर भी मैं आत्मा को नहीं जानता यह प्रतीति ओर अकर्ता आत्मा में कर्तृत्व की प्रतीति जिससे होती है, वह मन है, ऐसा कहते हैं। चैतन्यस्वरूप होते हुए भी पुरुष को जिससे मैं आत्मा को नहीं जानता हूँ , ओर अकर्ता होते हुए भी मैं कर्म कर रहा हूँ , ऐसा निश्चय नियतरूप से होता है, वह मन का स्वरूप है