Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
कल्पनात्मिकया कर्मशक्त्या विरहितं मनः ।
न संभवति लोकेऽस्मिन्गुणहीनो गुणी यथा ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
स्पन्दरहित (निष्क्रिय) मन में इस लक्षणकी अव्याप्ति की आशंका कर कहते है ।
इस लोक में जैसे गुणीका गुण से हीन होना संभव नहीं हे, वैसे ही मनका भी कल्पनात्मक
क्रियाशक्ति से रहित होना सम्भव नहीं है