Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यथा वह्न्यौष्ण्ययोः सत्ता न संभवति भिन्नयोः ।
तथैव कर्ममनसोस्तथात्ममनसोरपि ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे परस्पर भिन्न हुए अग्नि ओर उष्णता का
अस्तित्व नहीं रह सकता वैसे ही भिन्न हुए कर्म ओर मनका तथा जीव ओर मनका अस्तित्व
नहीं रह सकता अर्थात् जैसे अग्नि और उष्णता अभिन्न हे, वैसे ही कर्म ओर मन तथा जीव
और मन भी अभिन्न है ॥