Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
स्वेनैव चित्तरूपेण कर्मणा फलधर्मिणा ।
संकल्पैकशरीरेण नानाविस्तरशालिना ॥ ८ ॥
इदं ततमनेकात्म मायामयमकारणम् ।
विश्वं विगतविन्यासं वासनाकल्पनाकुलम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
एकमात्र संकल्परूप विविध विस्तार से शोभित होनेवाले फलजनक
चित्तरूपी कर्म ने स्वयं ही इस नानाविध विश्व का विस्तार कर रक्खा है, जो मायामय,
कारणशून्य, विविध रचनाओं से युक्त ओर वासना की कल्पनाओं से व्याप्त है