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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verses 12–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 97, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । भगवन्भवता प्रोक्ता जातयस्त्रिविधा नृणाम् । प्रथमं कारणं तासां मनः सदसदात्मकम् ॥ १२ ॥ तत्कथं शुद्धचिन्नाम्नस्तत्त्वाद्बुद्धिविवर्जितात् । उत्थितं स्फारतां यातं जगच्चित्रकरं मनः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार मन से जगत्‌ की उत्पत्ति भले ही हो, किन्तु कूटस्थ चिन्मात्र स्वभाववाले ब्रह्म से मनकी तो उत्पत्ति नहीं हो सकती। (तन्मनोऽकुरुत आत्मन्वी स्याम्‌” (उसने मनस्वी होऊ, इस आशय से मन की सृष्टि की) इस श्रुति से मनकी सृष्टि बुद्धिपूर्वक सुनी जाती है । मनकी उत्पत्ति से पहले बुद्धि का सम्भव नहीं है। जो वस्तु मनसे पर्यालोचित नहीं है, उसमें अध्यवसाय कहीं पर नहीं देखा जाता, ऐसी श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, आपने जीवों की जो तीन प्रकार की जातियाँ (५६) कही है ओर सद्‌-असद्‌ रूप मनको उनका मुख्य कारण कहा है, किन्तु मुझे इस विषय में आशंका है कि बुद्धिशून्य शुद्ध चित्‌-नामक तत्त्वसे जगद्रूप चित्रका चितेरा मन कैसे उत्पन्न हुआ ओर कैसे जगद्रूप विस्तार को प्राप्त हुआ ?