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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 97, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । आकाशा हि त्रयो राम विद्यन्ते विततान्तराः । चित्ताकाशश्चिदाकाशो भूताकाशस्तृतीयकः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस आशंका का भी आगे कहे जानेवाले दृृष्टिभेद के अभिप्राय से सत्कार्यवादका अवलम्बन कर समाधान करने की इच्छा करनेवाले श्रीवसिष्ठजी उसके उपयोगी तीन आकाशो की कल्पना दशति हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्ताकाश, चिदाकाश और तीसरा भूताकाश ये तीन आकाश विद्यमान है, जिनका उदर अत्यन्त विस्तीर्ण है