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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 97, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

एते हि सर्वसामान्याः सर्वत्रैव व्यवस्थिताः । शुद्धचित्तत्वशक्त्या तु लब्धसत्तात्मतां गताः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

ये तीनों आकाश अपने सब कार्योमें साधारण हैं, सब स्वकार्योमिं अनुगत है, अतएव उनके हेतु हैं । इससे अद्वैतहानिकी शंका करना उचित नहीं है, क्योंकि इनकी पृथक्‌ सत्ता नहीं मानी गई है । कारण कि शुद्ध चित्‌-तत््व की शक्ति से ही उन्होंने अपनी सत्ता प्राप्त की है यानी शुद्ध चित्‌ की सत्ता से उनकी सत्ता पृथक्‌ नहीं है