Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 97, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मात्मनि जगत्यस्मिन्मन एकाकृतिं गतम् ।
क्वचिन्नरतया रूढं क्वचित्सुरतयोत्थितम् ॥ ३ ॥
क्वचिद्दैत्यतयोल्लासि क्वचिद्यक्षतयोदितम् ।
क्वचिद्गन्धर्वतां प्राप्तं क्वचित्किन्नररूपि च ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्यात्मक इस जगत् में मन मुख्य आकृति को (जगद्रूप स्थितिको) प्राप्त
हुआ है यानी मन ही ब्रह्मात्मक जगत्का संस्थापक है । कहीं पर वह नररूप से उदित हुआ
है, तो कहीं पर देवरूप से उत्पन्न हुआ है, कहीं पर दैत्यरूप से उसका विकास हुआ है,
तो कहीं पर वह गन्धर्वता को प्राप्त हुआ है, कहीं पर यक्षके रूप से उसका उदय हुआ है
और कहींपर किन्नररूप से वह स्थित है