Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 97, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
नानाचारनभोभागपुरपत्तनरूपया ।
मन्ये विततयाकृत्या मन एव विजृम्भते ॥ ५ ॥
एवं स्थिते शरीरौघस्तृणकाष्ठलतोपमः ।
तद्विचारणया कोऽर्थो विचार्यं मन एव नः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरा यह दृढ़ निश्चय
है कि विविध प्रकार के आचार, आकाशप्रदेश, ग्राम, नगर आदिरूप अपनी विस्तृत आकृति
से (विचित्र ढाँचे से) मनही विराजमान है । ऐसी अवस्था में शरीरसमूह तृण, काठ, लता
आदि के तुल्य हैं, उनके विचार से क्या प्रयोजन निकल सकता है ? हमे तो केवल मनका
ही विचार करना चाहिए। भाव यह है कि जैसे पृथ्वी आदि भूतों के तत्त्व को जानने की
इच्छा करनेवाले के लिए तृण, काठ आदि प्रत्येक विचार करने योग्य नहीं है, वैसे ही मनके
तत्त्वके जिज्ञासुओं के लिए शरीरों के समूहों का विचार करना अनावश्यक है