Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verses 11–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 98, verses 11–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 11-18

संस्कृत श्लोक

ततः कालेन बहुना सोऽन्धकूपात्समुत्थितः । पुनः प्रहारैः प्रहरन्विद्रवत्यात्मनात्मनः ॥ ११ ॥ पुनर्दूरतरं गत्वा करञ्जवनगुल्मकम् । प्रविष्टः कण्टकव्याप्तं शलभः पावकं यथा ॥ १२ ॥ तस्मात्करञ्जगहनाद्विनिःसृत्य क्षणादिव । पुनः प्रहारैः प्रहरन्विद्रवत्यात्मनात्मनः ॥ १३ ॥ पुनर्दूरतरं गत्वा शशाङ्ककरशीतलम् । कदलीकाननं कान्तं संप्रविष्टो हसन्निव ॥ १४ ॥ कदलीखण्डकात्तस्माद्विनिःसृत्य क्षणात्पुनः । स्वयं प्रहारैः प्रहरन्विद्रवत्यात्मनात्मनि ॥ १५ ॥ पुनर्दूरतरं गत्वा तमेवान्धोऽन्धकूपकम् । स संप्रविष्टस्त्वरया विशीर्णावयवाकृतिः ॥ १६ ॥ अन्धकूपात्समुत्थाय प्रविष्टः कदलीवनम् । कदलीकाननाच्छ्वभ्रं करञ्जवनगुल्मकम् ॥ १७ ॥ करञ्जकाननात्कूपं कूपाद्रम्भावनान्तरम् । प्रविशन्प्रहरंश्चैव स्वयमात्मनि संस्थितः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्ववत्‌ मुद्गरो के प्रहारो से अपने को पीटता हुआ भागने लगा । तदुपरान्त बहुत दूर जाकर जैसे पतंगा आगमे प्रवेश करता हे वैसे ही वह अनेक दूसरे काँटों से भी भरपूर करौंदों की लताओं से खूब आच्छन्न थोडी छायावाले दुःखपूर्ण करदे के वनकी झाड़ीमें प्रविष्ट हो गया | उस करदे के वन से थोड़ी ही देरमें बाहर निकल कर फिर मुद्गरो के प्रहारो से अपने ऊपर प्रहार करता हुआ भयका कोई दूसरा निमित्त न होने पर भी अपने से आप ही भागने लगा । फिर बहुत दूर जाकर चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल बड़े मनोहर केले के वनमें बड़ा प्रसन्न हुआ-सा प्रविष्ट हुआ क्षणभरमें उस केलेके वनसे बाहर निकल कर फिर अपने ऊपर अपने आप प्रहार करता हुआ दौड़ने लगा । फिर अति दूर जाकर विवेकदुष्टि से शून्य वह पुरुष, जिसके अंग-प्रत्यंग जर्जरित हो गये थे, जल्दी से उसी अँधेरे कुएँ में घुस गया । अंधेरे कुएँ से बाहर निकल कर केले के वन में प्रविष्ट हो गया । केले के वन से गड्ढे के समान गहरे करौदे के वन की झाड़ी में प्रविष्ट हुआ | करौदे के वन से अधरे कुएँ में गिरा, कुएँ से निकल कर दूसरे केले के वन में प्रवेश कर रहा और अपने ऊपर स्वयं प्रहार कर रहा वह स्थित था