Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 98, Verses 6–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 98, verses 6–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 98 · श्लोक 6-10
संस्कृत श्लोक
तस्यामेको हि पुरुषः सहस्रकरलोचनः ।
पर्याकुलमतिर्भीमः संस्थितो वितताकृतिः ॥ ६ ॥
स सहस्रेण बाहूनामादाय परिघान्बहून् ।
प्रहरत्यात्मनः पृष्ठे स्वात्मनैव पलायते ॥ ७ ॥
दृढप्रहारैः प्रहरन्स्वयमेवात्मनात्मनि ।
प्रविद्रवति भीतात्मा स योजनशतान्यपि ॥ ८ ॥
क्रन्दन्पलायमानोऽसौ गत्वा दूरमितस्ततः ।
श्रमवान्विवशाकारो विशीर्णचरणाङ्गकः ॥ ९ ॥
पतितोऽवश एवाशु महत्यन्धोऽन्धकूपके ।
कृष्णरात्रितमोभीमे नभोगम्भीरकोटरे ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
उस महाटवी में महाकाय अतिभयंकर
तथा हजारों बाहुओं और हजारों नेत्रों से युक्त एक पुरुष रहता है । उसकी बुद्धि कभी ठिकाने
नहीं रहती हे । मैंने देखा-हजारों बाहुओंसे बहुत से मुद्गर को लेकर अपनी पीठपर स्वयं ही
प्रहार कर रहा वह भाग रहा है। स्वयं ही अपने ऊपर दृढ़ प्रहारों से प्रहार कर रहा वह भयभीत
होकर सैंकड़ों योजनों तक दौड़ रहा है । रोते-रोते भाग रहा वह इधर-उधर बहुत दूर जाकर
परिश्रान्त, परवश हो गया, चलने से जर्जरित पैर और अन्यान्य अंगवाला और विवेकरूपी
दृष्टिसे रहित वह विवश होकर शीघ्र महान् कूप में गिर पड़ा । वह कूप अन्धकार से कृष्णपक्षकी
रात्रि की नाई भीषण था, ऐसा भीषण कि ज्ञात होता था मानों वह आकाश का खूब गहरा कोट
हो