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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 99, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

यैरहं पुंभिरबुधैर्बुद्धिचित्ततिरस्कृतः । तैर्मनोभिरनात्मज्ञैः स्वविवेकस्तिरस्कृतः ॥ २० ॥ त्वया दृष्टो विनष्टोऽस्मि त्वं मे शत्रुरिति द्रुतम् । यदुक्तं तद्धि चित्तेन गलता परिदेवितम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिन अज्ञानी पुरुषोंने बुद्धि अथवा चित्त से विचाररूप मेरी उपेक्षा की यानी विचारोद्योग नहीं किया, ऐसा मैंने जो कहा, वह उन अज्ञानी मनोंने अपने विवेकका तिरस्कार किया । तुमसे देखा गया मैं विनष्ट हो गया हूँ तुम मेरे शत्रु हो, जो यह कहा, वह तत्त्वज्ञान से जर्जरित हो रहे (गल रहे) चित्त ने विलाप किया