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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verses 29–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 1, verses 29–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

न किंचिद्यत्कथं किंचित्तत्रास्ते वस्तु वस्तुनि । अस्ति चेत्तत्कथं तत्र विद्यमानं न दृश्यते ॥ २९ ॥ न किंचिदात्मनः किंचित्कथमेति कुतोऽथवा । शून्यरूपाद्धटाकाशाज्जातोऽद्रिः क्व कुतः कदा ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जो वस्तु कुछ भी नहीं है, उस वस्तु में कुछ भी कैसे रह सकता है ? यदि है तो वहाँ पर रहती हुई वह क्यों नहीं दिखाई देती ? “अर्थात्‌ आदेशों नेति नेति" इस श्रुति से सबके निषेधस्वरूप आत्मा से क्या वस्तु, कैसे और कहाँ से उत्पन्न होगी शून्यरूप घटाकाश से कहाँ, कैसे और कब पर्वत उत्पन्न हुआ यानी शून्यरूप घटाकाश से जैसे पर्वत का उत्पन्न होना असम्भव है वैसे ही सर्वनिषेधस्वरूप परमात्मा से इसकी उत्पत्ति का सम्भव नहीं है