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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verses 27–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 1, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

तत्सूक्ष्ममसदाभासमसदेव ह्यतादृशम् । कीदृशी बीजता तत्र बीजाभावे कुतोऽङ्कुरः ॥ २७ ॥ गगनाङ्गादपि स्वच्छे शून्ये तत्र परे पदे । कथं सन्ति जगन्मेरुसमुद्रगगनादयः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार तत्त्वदृष्टि से बीजत्व का परमात्मा मे असम्भव कहते हैं। वस्तुतः सदेकरस भी वह सूक्ष्म होने के कारण नहीं दिखाई देने से असत्‌ के तुल्य प्रतीत होता है, इसलिए असत्‌ ही है । इस प्रकार के परमात्मा में बीजता कैसे ओर बीज के अभाव में जगदंकुर की उत्पत्ति कैसे आकाश की अपेक्षा भी अत्यन्त सूक्ष्म शून्य उस परम पद में जगत, मेरु, समुद्र, आकाश आदि कैसे स्थित हैं