Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 1, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
मेरुरास्ते कथमणौ कुतः किंचिदनाकृतौ ।
तदतद्रूपयोरैक्यं क्व च्छायातपयोरिव ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
भले ही भेद से परमात्मा में जगत की स्थिति न हो, उसके साथ अभेद से तो उसकी स्थिति होगी
ही, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते हैं।
अणु में मेरु कैसे रह सकता है ? निराकार परमात्मा में यह जगत कैसे स्थित हो सकता है ? छाया
ओर प्रकाश के तुल्य परस्पर भिन्न रूपों की एकता कहाँ हो सकती है ?