Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verses 34–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 1, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
देशान्तरे यच्च नरान्तरे च बुद्ध्यादिसर्वेन्द्रियशक्ति दृश्यम् ।
नास्त्येव तत्तद्विधबुद्धिबोधे न किंचिदित्येव तदुच्यते च ॥ ३४ ॥
कार्यस्य तत्कारणतां प्रयातं वक्तीति यस्तस्य विमूढबोधः ।
कैर्नाम तत्कार्यमुदेति तस्मात्स्वैः कारणाद्यैः सहकारिरूपैः ॥ ३५ ॥
दुर्बुद्धिभिः कारणकार्यभावं संकल्पितं दूरतरे व्युदस्य ।
तदेव तत्सत्यमनादिमध्यं जगत्तदेतत्स्थितमित्यवेहि ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ पर यह विचार करना चाहिये कि साख्यवादियो ने कारण में जगत की सत्ता की जो कल्पना
कर रक्खी है, वह क्या लौकिक प्रमाण के बलसे कर रक्खी है अथवा (सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" इस
श्रुति के बल से कर रक्खी है, पहला पक्ष ठीक नहीं है, ऐसा कहते हैं।
जो बुद्धि आदि सम्पूर्णं इन्द्रियों की शक्ति से दृश्य यानी अनुभव के योग्य घट, पट आदि हैं, वे
अपने अधिकरण देश से अन्य देश मे या अपने अधिकरणकाल से अतिरिक्त काल में स्वयं द्रष्टा रहने
या अन्यपुरुष के द्रष्टा रहने ओर न रहने पर तत्-तत् प्रकार के प्रत्यक्ष, अनुमान आदि बुद्धिवृत्तिरूप
बोध में नहीं है यानी भासित नहीं होते हैं अतः उक्त दृश्य के अदर्शन आदि के योग्य अनुपलब्धि से
कुछ भी नहीं हैं यानी असत् ही हैं, ऐसा सब लौकिक प्रामाणिक कहते हैं, इसलिए प्रलय में जगत के
सद्भाव की कल्पना सब लौकिकं की अनुपलब्धि से विरुद्ध है, यह भाव हे