Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 18–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 10, verses 18–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 18-20
संस्कृत श्लोक
खड्गपाशधरः श्रीमान्कुण्डली कवचान्वितः ।
षड्भुजः षण्मुखो बह्व्या वृतः किङ्करसेनया ॥ १८ ॥
यच्छरीरसमुत्थेन ज्वालाजालेन वल्गता ।
फुल्लकिंशुकवृक्षस्य बभाराद्रेः श्रियं नभः ॥ १९ ॥
यत्करस्थत्रिशूलाग्रनिःसृतैरग्निमण्डलैः ।
विरेजुरुदितैराशाः कानकैरिव कुण्डलैः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी शोभा अद्भुत
थी, उसके हाथ में खड्ग ओर पाश था, वह कुण्डलों से विभूषित था ओर कवच पहने था। प्रत्येक ओर
उसकी छः भुजाएँ (बारह मासरूप बारह भुजाएँ) थी, छः (ऋतुरूपी) मुख थे, अपनी बड़ी भारी किंकरों
की सेना से वह घिरा था । उस समय उसके शरीर से उत्पन्न हुई और चारों ओर फैल रही ज्वालाओं से
फूले हुए पलाश के वृक्षों से पूर्ण पर्वत की शोभा को आकाश धारण करता था। उसके हाथमें स्थित त्रिशूल
के शिखरों से बाहर निकल रही अग्नि की ज्वालाओं से, जो सुवर्ण के कुण्डलों के तुल्य प्रतीत होती थी,
दसों दिशाएँ सुशोभित हुई