Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 27–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 10, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
संसारावलयो ग्रस्ता निगीर्णा रुद्रकोटयः ।
भुक्तानि विष्णुवृन्दानि क्व न शक्ता वयं मुने ॥ २७ ॥
भोक्तारो हि वयं ब्रह्मन्भोजनं युष्मदादयः ।
स्वयं नियतिरेषा हि नावयोरेतदीहितम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
हमने संसार की पंक्तियों की पंक्तियाँ निगल डाली हैं, करोड़ों रुद्र चवा
डाले हैं, एक नहीं, हजारों विष्णुओं को ग्रस डाला है। हे मुनिजी, किस विषय में हम समर्थ नहीं हैं ? उसे
जरा उदाहरणरूप से उपस्थित तो कीजिये