Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 6–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 10, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
प्राक्तनीऽमुपभोगेहामिष्टानिष्टफलप्रदाम् ।
धाराधौतान्त्रया तद्वद्भृशं शुष्कास्थिमालया ॥ ६ ॥
शिरोघटेन शुभ्रेण मसृणेनेन्दुवर्चसा ।
विडम्बयच्च कर्पूराप्लुतलिङ्गशिरःश्रियम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
वह कंकाल वर्षा की धाराओं से धोई हुई अँतड़ी से और खूब
सूखी हुई हड्डियों की माला से भला और बुरा फल देनेवाली पूर्व काल की भोगवासना का अनुकरण
करता था एवं सफेद, चिकने तथा चन्द्रमा के समान प्रकाशमान सिररूपी घड़े से कपूर से लिप्त शिवलिंग
के सिर की शोभा का अनुकरण करता था