Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 67–70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 10, verses 67–70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 67-70
संस्कृत श्लोक
स कल्पावधिमासाद्य द्वादशादित्यधामनि ।
जगाम भस्मशेषत्वं शलभः पावके यथा ॥ ६७ ॥
जगन्निर्माणरहिते स्फारे नभसि सा ततः ।
वासना तस्य बभ्राम निर्नीडा विहगी यथा ॥ ६८ ॥
अथ कालेन संजाते विचित्रारम्भकारिणि ।
संसाररचनारम्भे ब्राह्मे रात्रिविपर्यये ॥ ६९ ॥
सा मुने वासना तस्य वातव्याचलिता सती ।
कृते ब्राह्मणतामेत्य जातोऽद्य वसुधातले ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
कल्परूपी अवधि को प्राप्त कर प्रलयकाल के एक साथ उदित
हुए बारह आदित्यो की ज्योति में जसे पतंगा अग्नि में भस्मता को प्राप्त होता हे वैसे ही वह भस्मशेष हो
गया । तदनन्तर जैसे घोंसले से रहित चिड़िया आकाश में घूमती है, वैसे ही उसकी वासना जगन्निर्माण
रहित विशाल आकाश में घूमती थी। तदनन्तर समय पाकर विचित्र-विचित्र विविध कर्म करनेवाले
संसार की सृष्टि के आरम्भ से युक्त ब्रह्मा का प्रातःकाल होने पर हे मुनिजी, आपके पुत्र की वह वासना
वायु से परिचालित होकर सत्ययुग में ब्राह्मणता को प्राप्त होकर इस भूमण्डल में उत्पन्न
हुई