Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
नोर्मयः संस्थिता ह्यब्धौ न तत्तत्र न संस्थिताः ।
केवलं स्वस्वभावस्थसंकल्पविकलीकृताः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त में पूरवोक्ति रीति से आरोप कह कर अपवाद दिखलाते हैं।
जलसमूहरूप सागर से वे तरंगें पृथक् नहीं हैं, इनका न तो सन्मय और न असन्मय कोई एक रूप
है और न हस्व, दीर्घ आदि गुण उनमें हैं और न उन गुणों में तरंगें ही हैं ॥ ३ ८॥ तरंगें समुद्र में स्थित नहीं
हैं। "समुद्र में स्थित नहीं है” ऐसा जो कहा गया है वह ठीक नहीं है, क्योंकि अधिष्ठानरूप से समुद्र में
उनकी सत्ता है, विर्वतरूप से तो प्रतियोगी की सिद्धि न होने से ही उनके अभाव की सिद्धि नहीं होती ।
तब वे तरंगें क्या हैं इस शंका पर कहते हैं कि केवल अपने स्वभाव में स्थित संकल्प से कल्प ली गई
हैं यानी परिच्छेदकृत भेद से कल्पित हैं