Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैवानघ तेनेदं स्फाराकारं विजृम्भते ।
नानारूपैः प्रतिस्पन्दैः परिपूर्ण इवार्णवः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार पूर्ववर्णित दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक की समता अक्षुण्ण रही, ऐसा कहते हैं ।
हे निष्पाप मुनिजी, इससे सिद्ध हुआ कि जैसे पूर्ण सागर ही भाँति-भाँति की लहरों, आवर्तो और
बुद्बुदों से विकसित होता है, वैसे ही ब्रह्म ही विशाल आकारवाले इस जगत रूप से विकसित होता
है