Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
नानातां स्वयमादत्ते नानाकारविहारतः ।
आत्मैवात्मन्यात्मनैव समुद्राम्भ इवाम्भसि ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र के जल में समुद्र का जल विविध प्रकार की गतिविधियों से अपने आप भेद को
प्राप्त करता है वैसे ही आत्मा में आत्मा ही अपने-आप ही नाना प्रकार के विचरणों से नानात्व (भेद) को
धारण करता है