Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
अचितश्चेतसः शक्तिं स्वबन्धायेच्छया शिवः ।
तनोति तान्तवं कोशं कोशकारकृमिर्यथा ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि जब चित् का एक रूप है, तब उसके कार्यभूत अचित् में भेद कैसे सिद्ध
हुआ ? इस पर कहते हैं।
जैसे रेशम का कीड़ा अपने बन्धन के लिए तन्तुओं का लच्छा फैलाता है, वैसे ही आत्मा अपने
बन्धन के लिए अपनी इच्छानुसार अचित् चित्त की वासना की विचित्रता का विस्तार करता है