Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verses 70–74
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verses 70–74 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
काश्चिच्चला नरमृगगृध्रजम्बुलकादिकाः ।
स्फुरन्ति गिरिकुञ्जेषु वेलावनतटेष्विव ॥ ७० ॥
सुदीर्घजीविताः काश्चित्काश्चिदत्यल्पजीविताः ।
अतुच्छकलनाः काश्चित्काश्चित्तुच्छशरीरकाः ॥ ७१ ॥
संसारस्वप्नसंरम्भे काश्चित्स्थैर्येण भाविताः ।
सुविकल्पहताः काश्चिच्छङ्कन्ते सुस्थिरं जगत् ॥ ७२ ॥
अल्पाल्पभावनाः काश्चिद्दैन्यदोषवशीकृताः ।
कृशोऽतिदुःखी मूढोऽहमितिदुःखैर्वशीकृताः ॥ ७३ ॥
काश्चित्स्थावरतां याताः काश्चिद्देवत्वमागताः ।
काश्चित्पुरुषतां प्राप्ताः काश्चिदर्णवतां गताः ॥ ७४ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वत के कुजों
में तथा समुद्र की तीर भूमि के वन में वृक्ष, लता आदि के तुल्य चंचल कोई मनुष्य, मृग, गीध, सियार आदि
रूपवाली जीवसंवित् कुछ समय के लिए आविर्भूत होती हैं