Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 75
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verse 75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 75
संस्कृत श्लोक
काश्चित्स्थिता जगति कल्पशतान्यनल्पाः काश्चिद्व्रजन्ति परमं पदमिन्दुशुद्धाः ।
ब्रह्मार्णवात्समुदिता लहरीविलोलाश्चित्संविदो हि मननापरनामवत्यः ॥ ७५ ॥
हिन्दी अर्थ
इन जीवसंविदों में किन्हींकी आयु
बहुत लम्बी है, कोई बहुत थोड़े दिनों तक जीवित रहती हैं, किन्हींकी शरीर कल्पना विशाल है, किन्हीं
का शरीर अत्यन्त तुच्छ हे । इस संसाररूपी स्वप्न में कोई अपने चिरस्थायित्व की भावना करती हैं, कोई
दृढ़ विकल्पों से मोहित होकर जगत को स्थिर समझती हैं | कुछ दीनता आदि दोषों से आक्रान्त होकर
अपने जीवन की अत्यन्त अल्पता की भावना करती हैं। मैं दुबला हूँ, अत्यन्त दुःखी हूँ और अत्यन्त मूढ
हूँ, इस तरह दुःखों से परवश होकर कोई जीव स्थावरता को प्राप्त हुए हैं कोई देवत्व को प्राप्त हुए हैं, कोई
पुरुषता को प्राप्त हुए हैं और कोई मोहसागरता को प्राप्त हुए हैं ॥७ १-७४॥ सागर से उत्पन्न हुई लहरी
के समान चंचल कुछ जीव, जिनका कि मनन दूसरा नाम है, ब्रह्मरूपी सागर से उत्पन्न हुए हैं। उनमें
विशाल शरीरवाले कुछ तो सैकड़ों कल्प तक जगत में रहते हैं और कुछ ज्ञानरूपी अमृत से पूर्ण होने के
कारण चन्द्रमा के तुल्य स्वच्छ होकर स्वरूपस्थितिरूप मोक्ष को प्राप्त होते हैं