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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 12, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 12, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

काश्चिद्भोक्तव्यजन्मौघभुक्तजन्मौघकोटयः । वन्ध्याः प्रकाशतामस्यः संस्थिता भूतजातयः ॥ १४ ॥ काश्चिदूर्ध्वादधो यान्ति यथा हस्तान्महत्फलम् । ऊध्वादूर्ध्वतरं काश्चिदधस्तात्काश्चिदप्यधः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

कुछ जीव, अवश्य भोगने योग्य जन्मसमूहों से जिन्होंने करोड़ों जन्मों का भोग कर लिया है फिर भी मोक्ष की प्राप्ति न होने से वन्ध्य तथा अधिकारी देह की प्राप्ति से प्रकाश में भी राग आदि से अन्धे होने के कारण तामसिक वृत्तिवाले होकर स्थित हैं। कोई जीव ऊपर से नीचे गिरते हैं जैसे हाथ से बड़ा भारी फल गिरे, कोई ऊपर से और अधिक ऊपर चढ़ते हैं और कोई नीचे से और नीचे गिरते हैं