Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 12, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 12, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
ता एताः काश्चिदत्यच्छा यथा हरिहरादयः ।
काश्चिदल्पविमोहस्था यथोरगनरामराः ॥ ८ ॥
काश्चिदत्यन्तमोहस्था यथा तरुतृणादयः ।
काश्चिदज्ञानसंमूढाः कृमिकीटत्वमागताः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
इनमें से कोई ये जीव अत्यन्त निर्मल हैं, जैसे कि विष्णु, हर आदि | कोई ज्ञानाधिकार की
योग्यता के पाने से अल्प मोह में स्थित हैं, जैसे नाग, मनुष्य और देवता आदि | कोई अत्यन्त मोह मे
स्थित हैं, जैसे वृक्ष, तृण आदि। कोई अज्ञान से मोह युक्त होकर कृमि और कीड़ों की योनियों को प्राप्त
हुए हैं। कृमि-कीटों में इष्ट ओर अनिष्ट में प्रवृत्ति और निवृत्ति की क्षमता होने से स्थावर योनियों के
तुल्य अत्यन्त मोह नहीं है, यह भाव है