Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 13, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 13, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अक्षीयमाणं हि मनो मोहायैव न सिद्धये ।
नीहार इव संछाद्य वेताल इव वल्गति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षीणता को प्राप्त न होता
हुआ मन मोह के लिए ही होता है, न कि सिद्धि के लिए। वह कुहरे के समान ढककर बेताल के समान
नाचता है यानी कुहरा जैसे आकाश को आवृत कर देता है वैसे ही अक्षीयमाण मन तत्त्व को आवृत कर
देता है और जैसे वेताल नाच द्वारा विक्षेप करता है वैसे ही वह विक्षेप करता है