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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, Verses 15–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 14, verses 15–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 15-18

संस्कृत श्लोक

ददर्शाथ तटे तस्मिन्कस्मिंश्चित्तनयं भृगुः । देहान्तरपरावृत्तं भावमन्यमुपागतम् ॥ १५ ॥ शान्तेन्द्रियं समाधिस्थमचञ्चलमनोमृगम् । सुचिरादिव विश्रान्तं सुचिरश्रमशान्तये ॥ १६ ॥ चिन्तयन्तमिवानन्ताश्चिरभुक्ताऽचिरोज्झिताः । संसारसागरगतीर्हर्षशोकनिरन्तराः ॥ १७ ॥ नूनं निश्चलतां यातमतिभ्रमितचक्रवत् । अनन्तजगदावर्तविवर्तातिशयादिव ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पहुँचने के अनन्तर समंगा नदी के किनारे कहीं पर भृगु ऋषि ने अपने पुत्र को देखा, उसने दूसरी देह का परिवर्तन किया था, अतएव वह शुक्राचार्य से विलक्षण भाव को प्राप्त हुआ था, उसकी इन्द्र्यो शान्त हो गई थी, समाधिस्थ होने से उसका मनरूपी मृग स्थिर हो गया था, मानों वह पुरुष अनादि संसारश्रम को दूर करने के लिये बहुत दिनों से विश्राम ले रहा था तथा अनादिकाल से भुक्त, थोड़े ही दिनों से परित्यक्त और हर्ष, शोक से भरी हुई संसार सागर की गतिओं का विचार कर रहा था, मानों अवश्य ही वह अनन्त जगद्रूपी आवर्त मेँ अतिशय भ्रमण से जोर से घुमाये हुए चक्र के तुल्य निश्चल हो गया था